विश्वविद्यालय  केन्द्र
Tripura University

विभाग का संक्षिप्त विवरण:

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, भारत सरकार नई दिल्ली के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 20 दिसंबर 2010 को त्रिपुरा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के साथ पांडुलिपि संसाधन केन्द्र (एम आर सी) तथा पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र (एम सी सी) अस्तित्व में आया। केन्द्र का उद्घाटन दिनांक 12.04.2011 को त्रिपुरा विश्वविद्यालय के माननीय कुलाधिपति प्रो. अमिय कुमार बागची के द्वारा किया गया।

 
 

समन्वयक का नाम:

प्रो. सत्यदेव पोद्दार।
प्राध्यापक, इतिहास विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय.
दूरभाष सं: -09436168068, ईमेल- This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

एमआरसी और एमसीसी केन्द्र में कार्य करने वाले कर्मचारियों का विवरण: 03 (तीन)

नामयोग्यतापदविशेषज्ञता
श्री शिबब्रत रॉयचौधरी संग्रहालय विज्ञान में में एमएससी संरक्षक एन आर एल सी, लखनऊ और राष्ट्रीय संग्रहालय से संग्रहालय विज्ञान प्रशिक्षण, नई दिल्ली, इनटैक, भुवनेश्वर से संरक्षण में यूनेस्को प्रशिक्षण
श्री निर्मल्य कर्मकार इतिहास में एम.ए.,पीएचडी(जारी) संरक्षक पांडुलिपियों के लिए राष्ट्रीय मिशन (एन एम एम) नई दिल्ली, इनटैक भुवनेश्वर और सरकार से निवारक और उपचारात्मक संरक्षण प्रशिक्षण. राज्य संग्रहालय इम्फाल. .
श्रीमती पापरी दास इतिहास में एम.ए. सहा. संरक्षक इनटैक भुवनेश्वर से लाइब्रेरी साइंस संरक्षण प्रशिक्षण

प्प्रदत्त विभिन्न कार्यक्रमों के पाठ्यक्रम :

संरक्षण कार्यशालाएं / सेमिनार / जागरूकता कार्यक्रम / का विवरण
पिछले तीन वर्षों के दौरान आयोजित तत्वबोध( व्याख्यान श्रृंखला):

    1. पाण्डुलिपि एवं पैलियोग्राफी कार्यशाला:

    इतिहास विभाग त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा 23 जुलाई से 7 अगस्त 2010 तक इस केन्द्र के स्थापित होने के पूर्व “पाण्डुलिपि विज्ञान एवं पैलियोग्राफी” पर पन्द्रह दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया
  1. सुरक्षात्मक संरक्षा पर कार्यशाला, 2011:
    1. “पाण्डुलिपियों की सुरक्षात्मक संरक्षा तथा जागरुकता” पर पाँचदिवसीय आधारभूत स्तर की कार्यशाला
    2. कार्यशाला 25 अप्रैल से आरंभ हुई तथा 29 अप्रैल 2011 तक चली
    3. 30 सदस्य शामिल हुए जिनमें त्रिपुरा के विभिन्न ग्रंथागारों के ग्रंथपाल, त्रिपुरा राज्य संग्रहालय, राज्य अभिलेखागार के क्यूरेटर तथा तकनीकी सदस्य, तथा त्रिपुरा राज्य विधानसभा, त्रिपुरा के प्रमुख संग्राहक, निजी संग्रहकर्ता, इतिहास, संस्कृत तथा बांग्ला विभाग के शोध अध्येता प्रशिक्षित किये गये।
    4. एमसीसी, त्रिपुरा विश्वविद्यालय के सहयोग से विभिन्न ग्रंथागारों के ग्रंथपाल अपने ग्रंथागारों में संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। एम सी सी त्रिपुरा सरकार के साथ संयुक्त रूप से मिलकर राज्य संग्रहालय तथा राज्य अभिलेखागार में संरक्षात्मक सुरक्षा का कार्य में लगी है। विभिन्न विभागों के शोध अध्येता एमसीसी के साथ मिलकर पोस्ट सर्वे का कार्य कर रहे हैं। संग्राहक भी सुरक्षात्मक संरक्षा की तकनीकी समझने हेतु आ रहे हैं और अब वे अपने संग्रहस्थलों में एमसीसी के सहयोग से इसे लागू कर रहे हैं।
  2. सुरक्षात्मक संरक्षा कार्यशाला, 2012:
    1. पाण्डुलिपियों की सुरक्षात्मक संरक्षा विषयक पाँचदिवसीय कार्यशाला
    2. कार्यशाला 30 अप्रैल को आरंभ हुई तथा 4मई 2012 तक चली।
    3. 35 सदस्य शामिल हुए जिनमें त्रिपुरा के विभिन्न ग्रंथागारों के ग्रंथपाल, त्रिपुरा राज्य संग्रहालय, राज्य अभिलेखागार के क्यूरेटर तथा तकनीकी सदस्य, तथा त्रिपुरा राज्य विधानसभा, त्रिपुरा के प्रमुख संग्राहक, निजी संग्रहकर्ता, इतिहास, संस्कृत तथा बांग्ला विभाग के शोध अध्येता प्रशिक्षित किये गये।
    4. पूर्वोत्तर राज्यों के सहभागी जैसे कमलानगर, मिजोरम, ताई अहोम संस्थान मोरानहाट असम, गुवाहाटी विश्वविद्यालय, लेडी ब्रेबोर्न कालेज कोलकाता असम विश्वविद्यालय के सदस्य भी उपस्थित रहे।
    5. कार्यशाला की प्रमुख विशेषता त्रिपुरा के विभिन्न जनजातियों की सहभागिता रही जिनमें विशेष रूप से मोग और चकमा जनजातियाँ हैं जिनके पास बड़ी मात्रा में पाण्डुलिपियाँ जमा हैं। मोग समुदाय मनु बंकुल, सतचंद, सिलाचारी, सबरूम, दक्षिण त्रिपुरा तथा चकमा समुदाय पेंचारथाल, दमचेरा, नलकटा, उनाकोटि के सुदूर स्थलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। धम्म दिपा सबरूम के कुछ बौद्ध पुजारियों ने भी कार्यशाला में भाग लिया। एमसीसी तथा एमआरसी द्वारा आयोजित जागरुकता कार्यक्रम पेंचारथाल में चकमा साहित्य फू, एक चकमा साहित्यिक शोध प्रकाशन के सहयोग से सफल हुआ। अन्य जागरुकता कार्यक्रम मनु बंकुल सबरूम दक्षिण त्रिपुरा में मोग सामाजिक सांस्कृतिक संगठन के सहयोग से मोग ग्राम में किया जाना प्रस्तावित है।
    6. तकनीकी सदस्य एमसीसी त्रिपुरा विश्वविद्यालय के सहयोग से अपने संबंधित स्थल पर सुरक्षात्मक संरक्षा का कार्य कर रहे हैं। एमसीसी त्रिपुरा राज्य सरकार के सहयोग से राज्य संग्रहालय, राज्य अभिलेखागार, जिला दण्डाधिकारी एवं कलेक्टर कार्यालय जहाँ विभिन्न मंदिरों की पाण्डुलिपियाँ हैं उन्हे संरक्षित करने का कार्य कर रही है। विभिन्न विभागों के शोध अध्येता एमसीसी के साथ मिलकर पोस्ट सर्वे का कार्य कर रहे हैं। संग्राहक भी सुरक्षात्मक संरक्षा की तकनीकी समझने हेतु आ रहे हैं और अब वे अपने संग्रहस्थलों में एमसीसी के सहयोग से इसे लागू कर रहे हैं।
    7. यह कार्यशाला सभी राष्ट्रीय प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों द्वारा सराही गई। एमआरसी तथा एमसीसी के पूरे त्रिपुरा में चल रहे कार्यों विशेष रूप से पेंचारथाल उनाकोटि जिले में आयोजित जागरुकता कार्यक्रम से संबंधित कुछ आलेख प्रतिष्ठित वेबसाइट्स में प्रकाशित हुए।
  3. राष्ट्रीय संगोष्ठी:
    1. तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “ पाण्डुलिपियों में परिलक्षित त्रिपुरा का इतिहास” । संगोष्ठी 19 जनवरी को आरंभ हुई तथा 21 जनवरी तक एमआरसी तथा एमसीसी त्रिपुरा विश्वविद्यालय के तत्वावधान में चली।
    2. विभिन्न प्रतिष्ठित विद्वानो एवं शिक्षाविदों जो न केवल भारत के थे बल्कि ढ़ाका विश्वविद्यालय बांग्लादेश से भी थे उनके द्वारा 25 शोधपत्र प्रस्तुत किये गये। रिसोर्स परसन कोलकाता विश्वविद्यालय, उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, रबीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, असम विश्वविद्यालय, वाराणसी, मणिपुर, सिलचर तथा त्रिपुरा के विभिन्न संस्थानों से थे।
    3. विभिन्न विभागों के शोध अध्येता, त्रिपुरा के विभिन्न कोनों के पाण्डुलिपि संग्राहक, तकनीकि सदस्य, विभिन्न ग्रंथागारों के ग्रंथपालों ने तकनीकि सत्रों एवं चर्चाओं में सक्रिय रूप से भागीदारी की। इसके द्वारा वे संगोष्ठी के विभिन्न पहलू से अवगत हुए।
    4. 25 शोध पत्र जो प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा संगोष्ठी में प्रस्तुत किये गये वे शीघ्र ही एमआरसी तथा एमसीसी, त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा विशेषज्ञों के पैनल द्वारा संपादन के पश्चात प्रकाशित किये जाने वाले हैं। आलेख अध्येताओं को सुधार एवं संपादन हेतु वापस किये गये हैं।
  4. तत्वबोध व्याख्यान:
    1. तत्वबोध व्याख्यान कार्यक्रम 2 मई 2011 को त्रिपुरा विश्वविद्यालय में “रिफलेक्शन ऑफ इंडियन सोसायटी एंड कल्चर इन इंगलिश मेनुस्क्रिप्ट”। कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रो. रंजीत सेन मुख्य वक्ता थे।
    2. तत्वबोध व्याख्यान कार्यक्रम 26 सितंबर 2011 को राजकीय डिग्री महाविद्यालय धर्मनगर में “मेनुस्क्रिप्ट एंड एन्सिएन्ट इंडियन लिट्रेटर” विषय पर आयोजित किया गया। प्रो. सीतानाथ डे संस्कृत विभाग त्रिपुरा विश्वविद्यालय मुख्य वक्ता थे।
  5. जागरुकता कार्यक्रम :
    1. प्रिवेंसन एंड कंजरवेशन ऑफ मैनुस्क्रिप्ट विषयक जागरुकता कार्यक्रम नेताजी सुभाष महाविद्यालय उदयपुर, दक्षिण त्रिपुरा में 8 अगस्त 2011 को आयोजित किया गया।
    2. प्रिवेंसन एंड कंजरवेशन ऑफ मैनुस्क्रिप्ट विषयक जागरुकता कार्यक्रम शासकीय डिग्री महाविद्यालय धर्मनगर, उत्तर त्रिपुरा में 26 सितंबर 2011 को आयोजित किया गया।
    3. प्रिवेंसन एंड कंजरवेशन ऑफ मैनुस्क्रिप्ट विषयक जागरुकता कार्यक्रम पेंचारथाल टाउन हाल, उनाकोटि में 24 अगस्त 2012 को चंगमा साहित्य फू, चकमा साहित्यिक एवं शोध प्रकाशन पेंचारथाल के सहयोग से आयोजित किया गया।
    4. यह जागरुकता कार्यक्रम सभी राष्ट्रीय प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों द्वारा सराही गई। मीडिया घराना जैसे आनंदबाजार पत्रिका, द टेलिग्राफ, पीटीआई, जी न्यूज तथा अन्य के द्वारा यह समाजार प्रमुख रूप से कवर किया गया। (क्लिपिंग इस प्रपत्र के साथ संलग्न है)
    5. एक मिनी जागरुकता कार्यक्रम टीटीएएडीसी खुमलवंग में 13 सितंबर 2012 को 30 सहभागियों के साथ (मुख्य रूप से त्रिपुरी जनजाति के लोग) आयोजित किया गया।
  6. आगामी कार्यक्रम तथा वर्ष 2013-14 के लिए नियोजित लिक्ष्य:
    1. विभिन्न भाषाभाषी जैसे मेतेई, बमी, मोग, चकमा एवं अन्य जनजातीय भाषा की पाण्डुलिपियाँ जो कि एमआरसी द्वारा खोजी और एकत्र की जा चुकी है उनके केटेलॉगिंग एवं डाक्यूमेंटेशन का कार्य करना।
    2. मैनुस्क्रप्ट का प्रिवेन्टिव एवं क्यूरेटिव कंजरवेशन। एमसीसी 100 वर्ष पुरानी पुस्तकों के बहुमूल्य संग्रह के संरक्षण हेतु योजना बना रहा है।
    3. त्रिपुरा के विभिन्न भागों विशेष रूप से त्रिपुरा के जनजातियों के मध्य विद्यालयों, महाविद्यालयों, लोक ग्रंथालयों, मदिरों तथा सामाजिक संगठनों में जागरुकता फैलाने हेतु मैनुस्क्रिप्ट की प्रदर्शनी तथा प्रिजर्वेशन एवं कंजरवेशन हेतु जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
    4. कैलाशहर, खोवाई, बेलोनिया और अम्बासा जैसे नये जिलों के शहरों में मैनुस्क्रिप्ट का पोस्ट सर्वे कार्य नियमित रूप से चलाया जायेगा।
    5. विद्यालयी बच्चों में मैनुस्क्रिप्ट के प्रिजर्वेशन संबंधी विद्यालय जागरुकता कैम्पेन का आयोजन तथा पब्लिक आउटरीच कार्यक्रम के रूप नुक्कड़ नाटक (स्ट्रीट प्ले) विभिन्न पंचायतों, विकासखंडों, तथा उन ग्रामों में जहाँ पाण्डुलिपियों की बड़ी संख्या उपलब्ध है।
    6. त्रिपुरा के सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं जहाँ बांग्लादेश से विभाजन के बाद आने वाले लोगों का बाहुल्य है। एमआरसी ने इन परिवार की पहचान कर ली है और शीघ्र ही उन तक पहुँचने की कोशिश की जा रही है।
    7. पाण्डुलिपियों के क्यूरेटिव कन्जरवेशन हेतु एक सुसज्जित प्रयोगशाला की स्थापना की जायेगी। एक छोटी प्रयोगशाला पहले से ही कार्यरत है।
    8. निजी संग्राहकों, निजी शोध संस्थानों जहाँ बड़ी संख्या में मैनुस्क्रिप्ट उपलब्ध हैं उनके साथ एमसीपीसी की स्थापना करना।
    9. डिजिटलाइजेश की प्रक्रिया आरंभ करना तथा त्रिपुरा के विभिन्न हिस्सों से संकलित बहुमूल्य पाण्डुलिपियों का प्रकाशन करना। ई-ग्रंथावली सॉफ्टवेयर पहले ही स्थापित किया जा चुका है।
    10. त्रिपुरा विश्वविद्यालय के एमसीसी तथा एमआरसी को पाण्डुलिपि दान करने वाले संग्राहकों के लिए सम्मान कार्यक्रम आयोजित करना।
    11. 12-16 मार्च 2013 को पाँचदिवसीय पाण्डुलिपि कार्यशाला प्रस्तावित है। इस कार्यशाला का उद्देश्य सहभागियों में प्राविधिक ढ़ंग से पाण्डुलिपियों का प्रिवेन्टिव कंजरवेशन हेतु जागरुकता एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराना। तथा प्रिवेन्टिव कंजरवेशन का मौलिक विचार विकसित करना।
  7. एमआरसी एवं एमसीसी को दान की गई पाण्डुलिपियाँ, विस्तारपूर्वक देखने के लिए,कृपया हमसे संपर्क करें
 

केंद्र की स्थिति की रिपोर्ट:

  • त्रिपुरा सरकार द्वारा वर्ष 2006 में आयोजित पिछले प्रि-सर्वे के अनुसार कुल पाण्डुलिपि जो त्रिपुरा के विभिन्न हिस्सों में मिलीं उनकी संख्या 567 है। इन 567 पाण्डुलिपियों में हरेकृष्ण आचार्जी(निजी संग्राहक), उदयपुर के पास 250 पाण्डुलिपियाँ हैं।
  • एमआरसी एमसीसी त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा दक्षिण त्रिपुरा, उत्तर त्रिपुरा, उनाकोटी, धर्मनगर, खोवाई, सबरूम तथा त्रिपुरा के अन्य भागों में आयोजित पोस्ट सर्वे में लगभग 500 के आसपास पाण्डुलिपियाँ पिछले वर्षों में अन्वेषित की गई हैं। पोस्ट सर्वे अभी भी चल रहा है।
  • शिलाचारी, मनुबंकुल(सबरूम), कैलाशहर, दमचेरा, कंचनपुर, मचमारा, पेंचारथाल(उत्तर त्रिपुरा एवं उनाकोटी) कमलपुर एवं खोवाई, में बड़ी संख्या में पाण्डुलिपियाँ हैं जो कि एमआरसी तथा एमसीसी द्वारा पहले ही ढ़ूढ़ी जा चुकी हैं।
  • श्री गोबिन्द बनर्जी, खोवाई, श्री रामगोपाल सिन्हा ,चेचुरिया तथा श्री बिजय शर्मा, विशालगढ़ के पास मणिपुरी पाण्डुलिपियों का विस्तृत संग्रह उपलब्ध है।
  • दक्षिण त्रिपुरा के मनु बंकुल, शिलाचारी, सतचन्द, शांतिरबाजार में मोग पाण्डुलिपियों का विशाल संग्रह है। एमसीसी तथा एमआरसी शीघ्र ही धम्म दिपा मनुबंकुल में जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करने वाली है।
  • उनाकोटी, तथा उत्तर त्रिपुरा के पेंचारथाल, दमाचेरा, नलकटा, पानीसागर, कंचनपुर में जागरुकता कार्यक्रम के दौरान बड़ी मात्रा में चकमा पाण्डुलिपियों का संग्रह प्राप्त हुआ।
  • बांग्ला विभाग के शोध अध्येता राजीवचन्द्र पॉल कमलपुर , धलाई जिला के पास पाण्डुलिपियों का अच्छा संग्रह है। एल लेइसाम शर्मा, कैलाशहर उनाकोटि जो कि असम विश्वविद्यालय के शोध अध्येता हैं उनके संग्रह में भी मणिपुरी पाण्डुलिपि का बड़ा संग्रह है।
  • एमआरसी एवं एमसीसी ने मंदिरों एवं त्रिपुरा के अन्य संस्थानों में उपलब्ध पुरानी बहुमूल्य पुस्तकों, प्रलेखों एवं पाण्डुलिपियों के संरक्षण की शुरुआत की है जो कि पिछले दिनों डीएम एवं कलेक्टर के संरक्षण में उपलब्ध कराई गई हैं।
  • केन्द्र ने राजशाही के दौरान के प्रलेखों, पाण्डुलिपियों, बहुमूल्य पुस्तकों, चित्रों, सिक्कों, एवं विशेष रूप से रबीन्द्रनाथ टैगोर के पत्रों जो कि त्रिपुरा राजपरिवार के संरक्षण में हैं उन्हे प्रिजर्व करने की पहल की है। राजपरिवार ने बहुमूल्य सामग्रियों के संरक्षण के हमारे प्रस्ताव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है। आने वाले समय में एमसीसी एवं एमआरसी त्रिपुरा विश्वविद्यालय और त्रिपुरा राजपरिवार संयुक्त रूप से राजबाड़ी परिसर में इन सामग्रियों की प्रदर्शनी आयोजित करने वाले हैं।

एमआरसी केंद्र, त्रिपुरा विश्वविद्यालय का प्रदर्शन:

  • एमआरसी ने त्रिपुरा के बहुमूल्य प्रलेखीय विरासत के प्रलेखीकरण का कार्य अपने हाथ में लिया है। प्राप्त पाण्डुलिपियों में अधिकतर बांग्ला और संस्कृत भाषा और लिपि में हैं।
  • पिछले दिनों बड़ी संख्या में ब्राह्मी एवं चकमा लिपि में लिखी मोग और चकमा पाण्डुलिपियां क्रमश: सबरूम एवं पेंचारथाल क्षेत्रों से प्राप्त हुई हैं।
  • अपने आरंभ से ही एमआरसी सर्वेक्षण एवं प्रलेखन के कार्य में बहुत सक्रिय रहा है। एमआरसी ने इस प्रकार बड़ी संख्या में पाण्डुलिपियों की कैटेलागिंग एवं प्रलेखन कर दिया है।
  • विभिन्न भाषाओं जैसे मैतेई, बर्मी, मोग तथा अन्य जनजातीय भाषाओं संबंधित पाण्डुलिपियों की कैटेलॉगिंग तथा डाक्यूमेंटेशन का कार्य शीघ्र ही प्रारंभ होने वाला है। राष्ट्रीय मैनुस्क्रिप्ट मिशन द्वारा भेजी गई डाटाशीट में में पाण्डुलिपियों के सूचीकरण एवं एक्सेसन कैटेलाग तैयार करने का कार्य आरंभ होने को है।
  • यह पूरे त्रिपुरा राज्य में पोस्ट सर्वे कार्यक्रम को भी देख रहा है तथा पाण्डुलिपियों के लिए राष्ट्रीय पंजिका का भी निर्माण कर रहा है। सर्वेक्षण का कार्य त्रिपुरा के सभी 8 जिलों में प्रगति पर है।
  • एमआरसी ने शासकीय संग्रहालय, राज्य अभिलेखागार, एमबीबी महाविद्यालय, टीटीएएडीसी ग्रंथालय खुमलवंग, निजी ग्रंथालयों तथा “रामप्रसाद गवेषणागार” एवं “राजेन्द्र कीर्तिशाला” जैसे त्रिपुरा के निजी संग्रहों में में सर्वेक्षण का कार्य किया।
  • एमआरसी ने एक्सटेंसिव कम्युनिकेशन कार्यक्रम राज्य में चलाया। जिसमें कार्यशाला, संगोष्ठी, व्याख्यान, जागरुकता कार्यक्रम, प्रचार कार्यक्रम, के द्वारा चुने हुए स्थलों पर पाण्डुलिपियों का इतिहास एवं संस्कृति के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में महत्व बताते हुए मिशन की गतिविधियों का प्रचार प्रसार किया।
  • एमआरसी द्वारा आयोजित इन कार्यक्रमों को लोगों द्वारा अच्छी प्रतिक्रिया मिली तथा इससे दूरस्थ क्षेत्रों में छिपी पाण्डुलिपियों को खोजने में सर्वेयर्स को सहायता हुई।
  • एमआरसी ने पाण्डुलिपियों के डॉक्यूमेंटेशन के लिए पहले ही ई- ग्रंथावली सॉफ्टवेयर स्थापित कर दिया है। तथा इन सूचनाओं को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्मेट में बदलकर राष्ट्रीय मैनुस्क्रिप्ट मिशन के बड़े उपयोग के लिए सीडी के रूप में डाटाबेस तैयार कर प्रेषित किया जा रहा है।

एमसीसी, त्रिपुरा विश्वविद्यालय का प्रदर्शन

    त्रिपुरा विश्वविद्यालय ने एमसीसी के रूप में कार्य करना मार्च 2011 से प्रारंभ किया है। एमसीसी प्रारंभ में प्रिवेन्टिव कन्जरवेशन तथा त्रिपुरा राज्य में कन्जरवेशन केन्द्र के रूप में स्थापित होने का कार्य किया है। मौलिक संरचना तथा मौलिक रसायनों के साथ एक छोटी संरक्षणात्मक प्रयोगशाला की स्थापना की गई जिसमें त्रिपुरा राज्य संग्रहालय, महाराजा बीर बिक्रम महाविद्यालय तथा त्रिपुरा राज्य अभिलेखागार के रूप में 3 संस्थाओं के प्रिवेन्टिव कंजरवेशन का कार्य आरंभ किया गया।
  • एमसीसी ने “रामप्रसाद गवेषणागार” एवं “राजेन्द्र कीर्तिशाला” – दो निजी स्वामित्व वाले शोध केन्द्रों में प्रिवेन्टिव कंजरवेसन का कार्य किया है। इसके अतिरिक्त सर्वेक्षण के दौरान जहाँ भी पाण्डुलिपियां मिलीं वहाँ उनके प्रिवेन्टिव एवं क्यूरेटिव कंजरवेशन का कार्य किया है। एमसीसी ने 100 वर्ष से अधिक समय की पुस्तकों के बहुमूल्य संग्रह के संरक्षण का कार्य प्रारंभ किया है।
  • एमसीसी का चार सदस्यीय दल कन्जरवेशन गतिविधियों को देखता है। एमसीसी के पास बड़ी मात्रा में कागजी पाण्डुलिपियां हैं जो कि बहुत अच्छी अवस्था में हैं इस तरह उसने लगभग 800 पाण्डुलिपियों का प्रिवेन्टिव केयर प्रारंभ किया है पाण्डुलिपियाँ मुख्य रूप से संस्कृत बांग्ला मोग तथा चकमा लिपियों में हैं। इसने आयुर्वेद, तंत्रमंत्र, ज्योतिष, पूजाविधि, नाटक, औषधि इत्यादि विभिन्न विषयों की 500 से अधिक पाण्डुलिपियों के प्रलेखन का कार्य किया है जो अधिकतर मध्यकालीन बांग्ला लिपि में हैं।
  • एमसीसी ने त्रिपुरा के कीमती दस्तावेजी विरासत के प्रलेखन का कार्य आरंभ किया है। त्रिपुरा के 8 जिलों में फैले क्षेत्र के नक्षत्र विज्ञान, इतिहास, साहित्य एवं औषधि जैसे विभिन्न विषयों कैटेलॉगिंग तथा डाक्यूमेटेशन पर ध्यान केन्द्रित किया है। ये मध्यकालीन संस्कृत एवं बंगाली लिपि में हैं। पिछले दिनों हमने चकमा और मोग लिपि में पाण्डुलिपियाँ प्राप्त की हैं। एमसीसी की प्रारंभिक भूमिका त्रिपुरा में कंजरवेशन न्यूक्लिअस स्थापित करना तथा इन अत्यंत प्राचीन पाण्डुलिपियों के संरक्षण की आवश्यकता है।
  • राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में जागरुकता एवं प्रचार कार्यक्रम तथा विभिन्न जिलों में विज्ञापनों से अच्छा प्रभाव हुआ है जिससे हमारे सर्वेयर्स को सुदूर क्षेत्रों की यात्रा कर छुपी पाण्डुलिपियों को प्राप्त करने में सहायता मिली है। केन्द्र ने एक्सटेन्सिव कम्युनिकेशन कार्यक्रम राज्य में चलाया है। केन्द्र विद्यालयों के स्तर पर पूरे राज्य में जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करने वाला है।