प्रशासन
Vice Chancellor

प्रो. विजयकुमार लक्ष्मीकांतराव धारूरकर

कुलपति

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संक्षिप्त परिचय :

डॉक्टर वि.ल. धारूरकर(64), विद्वान एवं प्रख्यात लेखक तथा जनसंचार एवं पत्रकारिता, इतिहास, उदारवादी कला, तथा विज्ञान के क्षेत्र के अत्यंत जाने माने व्यक्तित्व हैं। वह त्रिपुरा विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) के कुलपति हैं। इसके पूर्व वे यूडीएमसीजे विभाग के अध्यक्ष तथा अकादमिक स्टाफ महाविद्यालय के निदेशक रहे हैं। महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी ने उन्हे वर्तमान पद पर नियुक्त किया है।

डॉ. धारूरकर मराठवाड़ा क्षेत्र के प्रमुख शिक्षाविद एवं विद्वान हैं। वे मराठवाड़ा के उस्मानाबाद जिले के उमर्गा नामक स्थान के निवासी हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र में जन्म लेने के बाद भी डॉ. धारूरकर ने अपनी विलक्षणता, लगन, दृढ़निश्चय एवं प्रतिबद्धता के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में अपनी ख्याति हासिल की है।

उनका जीवन एवं उपलब्धियाँ अनुपम हैं। डॉ. धारूरकर ने अपना शैक्षणिक जीवन बिटको महाविद्यालय नासिक से इतिहास के प्रवक्ता के रूप में आरंभ किया(1975-76)। उसके बाद उनका चयन शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर के पत्रकारिता विभाग में प्रवक्ता के रूप में हुआ जहाँ उन्होने विभागाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। 1982 में डॉ. धारूरकर ने बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय(डीबीएएमयू) में प्रवक्ता के रूप में कार्यभार ग्रहण किया जहां पर बाद में वे विभागाध्यक्ष के रूप में पदोन्नत हुए।

वे कई विषय़ों में विशेषज्ञ हैं। उनके छात्र, शोधार्थी उनके ज्ञान एवं उनकी तीव्र बुद्धि से पूरी तरह प्रभावित रहते हैं। वे जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष रहे हैं। उसके बाद वे 2016-2019 में अभी तक ‘यूजीसी एमेरिटस प्रोफेसर’ के रूप में स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट निदेशालय से जुड़े हुए हैं।

डॉ. धारूरकर ने 27 पुस्तकें मराठी एवं 5 पुस्तके अंग्रेजी में प्रकाशित की हैं जिनमें से 3 पुस्तकें मीडिया से संबंधित हैं। डॉ. धारूरकर के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों में 253 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर के संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों में 181 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं। जबकि राज्य एवं क्षेत्रीय स्तर के संगोष्ठियों में 300 से अधिक शोधपत्र का प्रकाशन हुआ है। उन्होंने कोल्हापुर, गोवा, नासिक, अहमदनगर इत्यादि स्थानों में विशेषज्ञ व्याख्यान दिये हैं। वे अंग्रेजी, हिन्दी एवं मराठी धाराप्रवाह बोल सकते हैं साथ ही वे अन्य भारतीय भाषाओं मराठी(अहीरणी), कन्नड़ एवं तेलुगू के भी जानकार हैं। उन्होने सीनेट, शैक्षणिक परिषद, एवं विश्वविद्यालय योजना एवं विकास बोर्ड के सदस्य के रूप में भी कार्य किया है।

डॉ. धारूरकर को उनकी परियोजना “महाराष्ट्र में लोक मीडिया की जनसंचार क्षमता” के लिए 1994 में युवा वैज्ञानिक के ‘यूजीसी कैरियर एवार्ड’ से सम्मानित किया गया। उन्होने “ग्रामीण विकास में सूचना प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग” विषयक यूजीसी की शोध परियोजना भी पूरी की है और इस विषय में एक पुस्तक भी प्रकाशित की है।

उनको योग्य निर्देशन में जनसंचार एवं पत्रकारिता में 50 छात्रों ने पीएच.डी पूर्ण की है जिनमें से 6 वायसीएमओयू नासिक, पाँच एनएमयू जलगाँव, एसटीएमयू नांदेड़ से हैं।

वे कई शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं तथा उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता लाने हेतु मार्गदर्शन कर रहे हैं।वे जवाहरलाल नेहरू अभियांत्रिकी महाविद्यालय औरंगाबाद के महात्मा गाँधी मिशन के स्थानीय शाषी परिषद के सदस्य के साथ साथ भारत एवं विदेश के कई प्रमुख संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।

डॉ. धारूरकर को 2009 में प्रतिष्ठित “जैन विद्याभूषण पुरस्कार” सम्मान प्रदान किया गया। उनका शोधपत्र ‘एलोरा जैन केव्स’ 1985 में तीसरे अंतर्राष्ट्रीय जैन सम्मेलन में तथा 2008 में जैन मंजीरी कनाडा में प्रकाशित किये गये।

डॉ. धारूरकर का शोध पत्र अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नलों जैसे कैजैक रिव्यू, वेस्ट मैनेजमेंट जर्नल, यूएसए, एवं त्योरी कल्चर सोसायटी, यूके, में प्रकाशित हुए हैं। उनके शोधपत्र को मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा दिसंबर 2008 में आयोजित प्रबंधन संगोष्ठी में सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र सम्मानित किया गया।

उन्हे बॉम्बे जर्नलिस्ट एसोसिएसन द्वारा वर्ष 2002 से पत्रकारिता के पुरोधा प्राध्यापक के रूप में “लाइफटाइम एचीवमेंट एवार्ड” से भी सम्मानित किया गया। उन्हे ‘मराठवाड़ा रत्न पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया।

डॉ. धारूरकर का नाम 1000 कैम्ब्रिज इंटेलेक्चुअल ऑफ मिलेनियम तथा 500 हार्वर्ड सोसल साइंटिस्ट ऑफ एशिया में शामिल किया गया है। उनका नाम ‘हू इज हू इन द वर्ल्ड’ में भी शामिल किया गया है।

उनका नाम आईबीसी कैम्ब्रिज द्वारा 2007 के 100 सर्वश्रेष्ठ शिक्षक में भी सूचीबद्ध किया गया है। उन्होने 2008 में ‘प्लेटो सम्मान’ भी प्राप्त किया है। उन्होने जीवन के 64 वर्ष पार कर लिये हैं तथापि उनमें अध्यापन एवं जीवन के प्रति सकारात्मक सोच का विशेष उत्साह है।