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Tripura University

सिंहावलोकन :

त्रिपुरा में उच्च शिक्षा का आरम्भ विलम्ब से हुआ। वर्ष 1947 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन महाराजा बीर बिक्रम(एमबीबी) महाविद्यालय ने राज्य में प्रथम स्नातक महाविद्यालय के तौर पर कार्य करना प्रारम्भ किया। ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व त्रिपुरा में किसी अन्य प्रकार के उच्च शिक्षण संस्थान की स्थापना का प्रयास नहीं किया गया। वर्ष 1901 में त्रिपुरा के महाराजा राधाकिशोर माणिक्य ने तत्कालीन राजधानी अगरतला में एक स्नातक महाविद्यालय की स्थापना करने का प्रयास किया था, परन्तु उक्त प्रस्ताव को आवश्यक औपचारिकताओं के अभाव में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अनुमोदन नहीं मिला। वर्ष 1937 में त्रिपुरा के अन्तिम महाराजा बीर बिक्रमकिशोर माणिक्य ने पुन: अगरतला के पूर्वी भाग में झीलों से घिरी 254 एकड़ टीला भूमि पर ‘विद्यापत्तन योजना’ के अंतर्गत महाविद्यालय को स्थापित करने का निर्णय लिया। उच्चशिक्षा की इस योजना को कार्यान्वित करने हेतु मंत्री की अध्यक्षता में 10 सदस्यीय ’विद्यापत्तन शासी समिति’ का गठन किया गया। इस योजना के कार्यान्वयन हेतु सर्वप्रथम 50,000/- (पचास हजार रुपये) की राशि प्रदान की गई तथा दिनांक 7 मई, 1937 को महाराजा बीर बिक्रम ने महाविद्यालय की आधारशिला रखी, परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के छिड़ जाने की वजह से निर्माण कार्य को रोकना पड़ा। वर्ष 1942 ई. में जापान द्वारा बर्मा की हार के बाद त्रिपुरा की संवेदनशीलता को देखते हुए महाविद्यालय भवन के भू-तल को बर्मा आने-जाने वाले अंग्रेज सैनिकों की गतिविधियों के लिए सैनिक अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ तब भी कुछ कठिनाइयों के कारण निर्माण कार्य तत्काल प्रारम्भ नहीं हो सका। उसी दौरान दिनांक 17 मई, 1947 को महाराजा बीर बिक्रम की मृत्यु हो गई तथा अनेक कारणों से त्रिपुरा अशांत हो गया। परिणामस्वरूप सम्पूर्ण 'विद्यापत्तन योजना’ समय पर वास्तविक रूप में साकार न हो सकी। इस तरह त्रिपुरा में महाराजा बीर बिक्रम(एमबीबी) महाविद्यालय (बहुप्रचलित नाम “ड्रीम कॉलेज”) कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध एकमात्र महाविद्यालय हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, देश विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंग्लादेश) के विभिन्न भागों से विस्थापितों के पुनर्वास के फल:स्वरूप त्रिपुरा आए छात्रों की बढ़ती मांगों को देखते हुए निजी प्रयत्नों से कई महाविद्यालय स्थापित किये गये; यथा वर्ष 1950 में कैलाशहर में रामकृष्ण महाविद्यालय, वर्ष 1964 में बेलोनिया में बेलोनिया महाविद्यालय, वर्ष 1967 में अगरतला में रामठाकुर महाविद्यालय। ये सभी महाविद्यालय कलकत्ता विश्वविद्यालय से ही संबद्ध थे। उक्त स्थितियाँ त्रिपुरा के लोगों की उच्च शिक्षा के प्रति उत्साह को दर्शाती हैं। आजादी के बाद, आर्थिक पिछड़ेपन के बावजूद राष्ट्रीय औसत की तुलना में राज्य में जनसंख्या वृद्धि के साथ साक्षरता दर भी राष्ट्रीय साक्षरता दर की अपेक्षा ऊँची रही। पिछली सदी के सातवें दशक में त्रिपुरा के आम जन एवं छात्रों ने राज्य के तीनों निजी महाविद्यालयों को शासकीय दर्जा प्रदान कर उन्हें उन्नत बनाने का दबाव बनाया जिसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद वर्ष 1982 में तीनों निजी महाविद्यालयों को अपने अधीन कर शासकीय महाविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया ।

देश विभाजन के कारण आये भौगोलिक अलगाव की वजह से त्रिपुरा पारंपरिक परिवहन एवं आवागमन मार्गों, रेल तथा सड़क से कट गया तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से इसकी दूरी बढ़ जाने के कारण यहां के बहुसंख्यक गरीब छात्रों के लिए यह लगभग असम्भव हो गया कि वह स्नातक के उपरांत अध्ययन जारी रख सकें। इसे देखते हुए, पिछली शताब्दी में छठे दशक के अंत व सातवें दशक के प्रारंभ में त्रिपुरा में विश्वविद्यालय स्थापित करने हेतु अनेक बड़े छात्र आन्दोलन हुए। अंतत: बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम महाराजा बीर बिक्रम(एमबीबी) स्नातक महाविद्यालय को स्नातकोत्तर महाविद्यालय में परिवर्तित करने की योजना बनी। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एमबीबी महाविद्यालय में तीन विषयों - इतिहास, अर्थशास्त्र और गणित में स्नातकोत्तर कक्षाएँ प्रारम्भ की गईं, परन्तु महाराज बीर बिक्रम महाविद्यालय को स्नातकोत्तर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में परिवर्तित करने का प्रस्ताव पारित न हो सका। जबकि वर्ष 1976 में यूजीसी ने त्रिपुरा को कलकत्ता विश्विद्यालय की स्नातकोत्तर शाखा के रूप में ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर केन्द्र’ (सीयूपीजीसी) के नाम से स्वीकृति प्रदान की। इस प्रकार राज्य में एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय स्थापित करने की माँग पूरी न हो सकी। एक दशक तक कलकत्ता विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर केन्द्र (सीयूपीजीसी) टीला में बिखरी पड़ी विभिन्न सरकारी प्राचीन इमारतों के भवन को उक्त केन्द्र उपयोग करता रहा तथा कई पाबंदियों के बावजूद वह राज्य में सर्वोत्तम शिक्षण केन्द्र के रूप में कार्यरत रहा। पुन: गंभीर आर्थिक बाधाओं के बावजूद ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर केन्द्र’ (सीयूपीजीसी) के एक नए परिसर के लिए सरकार द्वारा राजधानी अगरतला से दक्षिण 10 किलोमीटर दूर सूर्यमणिनगर में राष्ट्रीय राजमार्ग पर हरे भरे अर्ध-नगरीय परिवेश में 75 एकड़ भूमि का चयन किया गया जहाँ भविष्य में एक नवीन विश्वविद्यालय की स्थापना का लक्ष्य था। 18 दिसम्बर 1985 को ऐतिहासिक जनशिक्षा आन्दोलन के प्रख्यात नेता तथा त्रिपुरा के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सह शिक्षामंत्री दशरथ देव द्वारा सूर्यमणिनगर परिसर में विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई।

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